श्रीनिवास रामानुजन

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श्रीनिवास रामानुजन( 22 दिसंबर को उनका जन्मदिवस है )

श्रीनिवास रामानुजन के बारे में पढ़ना किसी दिव्य सरोवर में धंसना है । जहां से बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं होती । पिछले दिनों उनके जीवन पर लिखी एक पुस्तक पढ़ते हुए मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ । कैसी विकट दरिद्रता में उन्होंने अपने दिन काटे थे और कैसा प्रचण्ड तेज था उस महामना गणितज्ञ का कि मरणासन्न जर्जर देह के साथ भी विलक्षण प्रमेय दे गए ।

रामानुजन की चंद तस्वीरें ही देखने को मिलती हैं लेकिन उनमें से अधिकांश धुंधली पुरानी पड़ चुकी तस्वीरों को देखते हुए उनकी आंखों को देखना सबसे विस्मयकारी अनुभव है । रामानुजन की आंखों में विचित्र चमक है, उतनी चमकदार आंखें विरले लोगों की होती हैं, जैसे देखने वाले को बेध डालें वे आंखें ।

आज दुनिया के सभी महान गणितज्ञ इस बात से सहमत हैं कि नैसर्गिक प्रतिभा में रामानुजन की तुलना संभवत: किसी और से हो ही नहीं सकती, जैकोबी और यूलर को छोड़कर । रामानुजन का पूरा जीवन ही इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि अध्यात्म से सिंचित भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा साक्षात ईश्वरीय संकेतों से चालित होती है।

रामानुजन के जन्म की कथा अनूठी है । उनकी कुलदेवी नामगिरी थीं जो कि भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की पत्नी मानी जाती हैं । देवी नामगिरी का रामानुजन के जन्मस्थान कुंभकोणम के पास एक मंदिर भी है । उनकी नानी नामगिरी की साधना करती थीं, ऐसी ही एक साधना के समय देवी उनके ध्यान में आईं और कहा कि वे उनकी पुत्री के पुत्र के रूप में जन्म लेंगी । इस तरह से रामानुजन साक्षात अवतारी प्रभा से युक्त बालक के रूप में पैदा हुए । उन्होंने अपने जीवन में चमत्कारी गणितीय सूत्र दिये और सभी सूत्रों का स्रोत देवी नामगिरी को माना । 
वे कहते थे कि उनके लिए ऐसे सभी गणितीय प्रमेय व्यर्थ हैं जिनमें आध्यात्मिक आभा न हो ।

सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में उन्होंने देह त्याग दिया । लेकिन जब विदा हुए तो पश्चिम का रंगभेदी दर्प ध्वस्त हो चुका था । रामानुजन ने सिद्ध कर दिया था कि प्रतिभा रंग की मोहताज नहीं होती । एक साधारण कद काठी के काले मद्रासी ने पूरे पश्चिमी अहंकार को चूर-चूर कर डाला था । प्रोफेसर और महान गणितज्ञ हार्डी, जिन्होंने रामानुजन को कैम्ब्रिज बुलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी,उन्होंने कहा था अगर उन्हें खुद को, महान गणितज्ञ लिट्लवुड और रामानुजन को आंकना हो तो वे खुद को सौ में पच्चीस, लिट्लवुड को पैंतीस और रामानुजन को सौ में से सौ अंक देंगे । महान दार्शनिक बर्टरेंड रसल हंस कर मजाक करते थे कि हार्डी और लिट्लवुड को लगता है कि उन्होंने पच्चीस पाउंड के खर्च में भारत से किसी नए न्यूटन को पा लिया है । ये वही रामानुजन थे, जिन्हें गणित की औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थीं और जिन्हें भुखमरी की हालत में मद्रास में सैकड़ों पापड़ बेलने पड़े थे ।

उन्हें याद करते हुए…

श्रीनिवास रामानुजन के लिए

जब तुम्हारे सहपाठी
अंकों के आवागमन में 
दिमाग के विश्राम का द्वार टटोलते थे
तब तुम शून्य से शून्य तक की
यात्रा कर रहे थे !
तुम अनंत में पहले उतर आए
वहां से अंत के सभी छोरों को 
कितनी सहजता से छू लिया तुमने 
संख्याएं तुम्हारी सहचरी बनीं
दुकान पर हिसाब में जुड़ने वाली नहीं
अनादि से अब तक 
गणितज्ञों के गूढ़ ब्रह्मांड में उड़ने वालीं
अगणित तारिकाओं की तरह टिमकने वालीं
तुमने अंकों की अनंताध्यायी रची 
जैसे एकल अंकों का वर्ण-विचार
उनकी संधियों और सामासिकता का स्वरूप
उनकी संज्ञा, विशेषण और सर्वनाम
काल के सतत प्रवाह में उनकी नई पहचान
संख्याओं का शाब्दिक संसार
और उनका विचित्र विन्यास भी 
यह सब तुमने कहां से सीखा?
तुम्हारी चमकती आंखों के पीछे
क्या उसी देवी का सरोवर था! 
जो अकसर तुम्हारे स्वप्न में आती रहीं
और खुद ही तोड़कर तुम्हें सौंपती रहीं 
सूत्रों के शतदल !

 
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