सच बोलता है

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कोई किताब बांटने निकलता है 
सच बोलता है 
कोई साग खरीदने निकलता है 
सच बोलता है 
कोई दफ्तर मेंं फंस जाता है 
सच बोलता है 
कोई दफ्तर की गाड़ी का इंतजार करता है 
सच बोलता है 
ये सभी अंततः सच्चे रास्ते पर चलते हैं 
फिर इन सभी लोगों को
अलग अलग चौराहों पर कुछ लोग मिलते हैं 
खुला बदन बैसाखी लिया बच्चा
कोई करतब करती बच्ची 
कुछ हिजड़े ताली मारती हुईं
ये सब झूठ बोलते हैं
सच सड़क पर चलता रहता है
सभी अपनी मंजिल पर जाते हैं 
थोड़ा थोड़ा झूठ और बहुत बड़ा सच 
धरती मेंं धंसा रह जाता है 
आकाश आदतन देखता रह जाता है

 
 
 

 

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