बस यूं ही

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जब छूट जाता है अपना गांव-घर
तब हम समझते हैं कि छूटी है पुरानी डगर 
पर अचानक जब कभी जुड़ते हैं पुराने लोग
तब जानते हैं कि टूटा है सांस और स्वरों का तार 
रूप-रस और स्पर्श का कोई अनूठा संसार 
खुलने लगते हैं पुराने अलबम से पुराने किस्से
ऋतुओं में जैसे टूटते हुए बसंत के भरे हिस्से
गांव छूटने के साथ ही छूट जाती हैं 
न जाने कितनी ही प्रेम की पगडंडियां
धूल-धूसरित, कीच सने गंदले रास्ते 
अनमने से चले आ रहे बैल दो आस्ते-आस्ते
लौंडे बदमाश… घूमते-टहलते यहां-वहां टोले.. 
उनमें अपनी दाल गलाते कुछ पप्पू और भोले 
बागीचे..खेत-खलिहान और पंपिग सेट का पानी 
फसल बर्बाद होने का ब्योरा देती बूढ़ी किसानी 
मचान का ताश दरवाज़े का घूरा,दालान के अट्टहास
छतों पर मचलते तारों को संभाले मुक्त आकाश 
नदी के घाट, बरगद के बाट और दादी की खाट
चापाकल की चांय-चांय, कुएं की कांय-कांय 
धार में घंटों नहाते लंपट लड़कों का डुबुक-डुबुक
डेंगापानी खेलते बच्चों का उछलकर कहना छुबुक-छुबुक
राजनीति की बहस, गुंडई का पर्चा नई फिल्म की चर्चा 
हास-परिहास, अजीबोगरीब चुटकुलों का च्यवनप्राश
परब त्योहार पर न्योतने की नीति, सहभोज की प्रीति
दोस्त, मित्र, भाई-बन्धु, काका-काकी दादा-दादी
भतेरे घऱों की भौजाइयां, अलसाती हुई पुरवाइयां 
लालटेन की उदास शामें, मुंह लटकाए मंदिर 
मुंडेर पर सिर हिलाकर पढ़ता मुन्ना मदिर-मदिर
हौले से दिन का परदा गिराती चुप होती सांझ 
तड़के ही खटर-पटर के साथ फिर खोलती आंख

 
 
 

 

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