वसंत मुझे प्रिय नहीं – Vasant Mujhe Pasand Nahi

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वसंत मुझे प्रिय नहीं है ।

मुझे प्रिय है शरद ।

वसंत तोड़ती है, आलस भरे प्रमद से जोड़ती है ।

शरद ऊर्जस्वित करती है । वर्षा से धुले अनंत नील मेंं घोलती है ।

शरद की सुबहें सम्मोहिनी होती हैं और शामें कृष्ण की तरह कसती हैं ।

उसकी दोपहर में बुद्धत्व का स्थैर्य होता है । शरद में शिशिर का संकेत है ।

वसंत मेंं ग्रीष्म का दुखद आभास है । वसंत में एक विचित्र,अनुत्तरित रूप से उत्सव बीत जाने की ऐंठन है ।

शरद में उत्सव का आमंत्रण है ।

 
 
 
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