दिल्ली के शोले

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दिल्ली के शोले

पंचमी को आई थी बसंती
शीशे की सरदी पर नाचती हुई
अगले ही दिन जब्बर जाड़े ने 
छठी का दूध याद दिला दिया 
बसंती कुढ़ कर कुड़कुड़ा गई
जब्बरवा फिर पसर गया 
ना वीरू काम आया ना जय 
सिहराता सांभा मुस्करा दिया
कुहरे कालिया ने देखा कनखियों से 
जाड़ा जब्बरवा खिसिया गया

 
 
 

 

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