घर

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घर

मेरे घर का आँगन
अपनी आँखें मलता हुआ नींद से जागा है अभी
और देख रहा है कि घर अब तक सो रहा 
ऐसी बेहोश नींद कि दालान से दो तल्ले तक
तीन पीढ़ियों का पता ही नहीं चलता
काल के कठिन किवाड़-सा
दुःस्वप्न का एक द्वार खुल रहा है, पार उसके
आँगन में पानी बह जाने के रेखाचित्र हैं
सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए गलियारे में
अंधे रास्ते पर चल पड़ी है रौशनी
धूप सुस्ताकर बरामदे पर चली गई है चुपचाप
इनसान, परिंदे नहीं आते टटोलने उसकी देह
बास उड़ चुकी है रसोई की कब की
पीले पड़ गए हैं हाथ में लड्‍डू लिये कान्हा के दांत
अर्चना देवी की पथराई-सी प्रतीक्षा है
माँ का कमरा कुछ टटोलता है
बाबूजी की बैठक चुप-चुप बोलती है
ताकते छज्जे नीचे आकर लटकते हैं
समय का स्थापत्य झरता है
छत बेसुध सो रही है न जाने कब से
अभी-अभी एक मायूस हवा गुजरी है वहाँ से.

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