पद्मावत

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पद्मावत के बहाने एक बार फिर….

लड़-लड़ जो रण बाँकुरे, समर,
हो शायित देश की पृथ्वी पर,
अक्षर, निर्जर, दुर्धर्ष, अमर, जगतारण
भारत के उर के राजपूत,
उड़ गये आज वे देवदूत,
जो रहे शेष, नृपवेश सुत-बन्दीगण…..निराला

निराला के अमर काव्य तुलसीदास में मुगलों के आधिपत्य में गल रहे भारतीय समाज का चित्रण है । साथ ही कवि कह रहे हैं कि जो महावीर उद्धारक, अक्षर राजपूत थे, जो भारत के उर थे, वे सब उड़ कर विलुप्त हो चुके हैं और जो रहे वे राजा के वेश में बंदियों के पुत्र हैं ।

आज पद्मावत पर जैसी स्थिति हो गई है, उसे देखकर मन अथाह दुख, ग्लानि और उद्वेग से भर उठा है । भारतीय इतिहास के सबसे बड़े लड़ाके इतने कमजोर, इतने शंकालु और आत्महंता हो चुके हैं कि खुद ही अपने शौर्य की महान गाथा को मलिन कर रहे ! न सिर्फ मलिन कर रहे बल्कि एक झटके में उसे पददलित कर कठमुल्लों के समक्ष खड़ा कर रहे ! और विरोध करने वाले हतभाग्य, हताश किकर्तव्यविमूढ़ हैं ! हम जैसे लोग कुछ लिखने से घबराते हैं कि अगले ही क्षण पच्चीस गालियां न पड़ जाए ।

कोई कहता है जा अपनी मां का डान्स देखता रह ! तो कोई कहता है कि उचक्के करणी सेना और उऩके समर्थक नहीं तू है तेरा बाप है…! इससे भी खऱाब खऱाब टिप्पणियां मुझे सुननी पड़ी हैं । यहां तक कि विदेशों में बैठे बड़े-बड़े ठाकुर साहब मुझे अमित्र किये दे रहे हैं ।

हद है,जिस इतिहास को मुल्लों के आक्रांतकारी युग में, सैकड़ों वर्षों के पराजय काल में, वामपंथियों के षड़यंत्र में दबाया मिटाया ना जा सका, उसे भंसाली एक घूमर दिखा कर मिटा दे रहा ! जो इतिहास राजस्थान के चप्पे-चप्पे से चलकर हमारे बिहार के भागलपुर जिले के गांव तक आ पहुंचा( मेरी मां ने बचपन में पद्मावती के जौहर की कथा सुनाई थी ) वो इतिहास भंसाली की एक फिल्म से नष्ट हो रहा ! हमारी सांस्कृतिक चेतना पर इससे दारुण अट्टहास क्या हो सकता है..!

छि:.. सोच कर शर्म आती है कि महाराणा कुंभा जैसे उज्ज्वल, धवल वीर की धरती पर इतने भाट और किन्नर उग आए हैं । जिन महाराणा ने युद्ध जीतने के साथ संगीत और नृत्य में खुद को प्रवीण किया, जो संगीत और नृत्य पर पुस्तकें लिखा करते थे, जो मध्यकालीन भारत के महानतन वास्तुकार थे.. उनके साम्राज्य को एक घूमर से खतरा है ! कहो तो बुरके में घूमर दिखा दें…? तुम्हारी आत्मा तर जाएगी । और तब तुम भारत से बहिष्कृत होकर अरब में वास करना । क्योंकि नृत्य को घृणा के भाव से देखने की रीत भारत की नहीं । वह तो देवाधिदेव के नटराज रूप में झुकने वालों का देश है ।

सबसे दुखद बात तो ये कि भारतीय बलिदान की प्रतीक चरित्र महारानी पद्मावती को अपनी भौजी बना कर बांध डाला है। यानी राजपूतों के सिवा पद्मावती के बारे में कोई बात नहीं करेगा । ऐसे एक नहीं सैकड़ों पोस्ट पढ़ चुका हूं.. रोज पढ़ता हूं । ऐसा लगता है जैसे बुद्धि विवेक पर महाकाल की छाया पड़ गई हो । भारत के वीर लड़ाके इतने विमूढ और अराजक कैसे हो सकते हैं ?

एक तरफ जिन नरेन्द्र भाई मोदी के नाम पर ये भारत माता की जय करते हैं.. दूसरी तरफ उन्हीं नरेन्द्र भाई की मिट्टी पलीद करते हैं । वो मुल्क-मुल्क घूमकर विदेशियों को भारत बुलाते हैं.प्राचीन भारत का गौरवगान करते हैं और हम अपने मुल्क में घूम-घूम कर विध्वंस करते हैं, मॉल जलाते हैं हुल्लड़ करते हैं, सेल्फी खिंचवाते हैं और इस तरह से देवी पद्मावती के सम्मान की रक्षा करते हैं ! और विदेशियों तक पैगाम भिजवाते हैं कि मोदी जो बोल रहे हैं उसे सिर्फ भाषण समझना.. क्योंकि हमारा असली रूप तो यही है ।

जिस मूर्ख ब्राह्मण ने मुझसे कहा था कि अपनी मां का डांस देखता रह, उससे मैंने तब भी कहा था, जरूर देखता अगर मेरी मां भारतनाट्यम की निष्णात नृत्यांगना होतीं, ना सिर्फ मैं देखता बल्कि फेसबुक पर सभी मित्रों को निमंत्रण देता कि आइये आज मेरी मांता की नृत्य की प्रस्तुति है । नृत्य क्या है, जानते ही नहीं और बकवास करते हैं ।
जिस ठाकुर ने कुछ भी जाने बगैर मुझे और मेरे पिता को नीच कहा, उसे एक बार अपने पिता से मिलवाता फिर पूछता कि बता कौन है नीच..

बंद कर दो ये अऩर्थ ! ये अन्याय है…। जब फिल्म का ट्रेलर आया था तभी ये स्थापित हो गया था कि फिल्म तो वस्तुत: राजपूती वीरता का बखान है.. लेकिन अफवाहों के सहारे उसे भारतीय संस्कृति पर सबसे बड़ा हमला बना दिया गया ।

सेंसर बोर्ड ने पास किया…सुप्रीम कोर्ट ने पास किया…श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि फिल्म तो राजपूती वीरता की गाथा है लेकिन सबको गाली ! जिन श्रीश्री के नाम की माला कुछ दिनों पहले तक जाप रहे थे उन्हें कहने लगे उसकी मां का साकीनाका ! पूरे मीडिया जगत को गरिया दिया, सबको भांड कह दिया और निकल पड़े सड़क पर उत्पात मचाने ।

अपने शौर्य के महान पूर्व को याद कर झुको, उसे उठान दो..उसकी अधौगति ना करो ! जरा सोचो, आज ओवैसी जैसे कठमुल्ले हम पर हंस रहे । इसलिए बंद कर दो ये उत्पात ! देवी पद्मावती.. सदैव पूजनीया रहेंगीं और मेवाड़ का मस्तक हमेशा ऊंचा रहेगा । कोई सिनेमा बनाने वाला उसे झुका नहीं सकता ।

 
 
 
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