कृष्ण

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बाण लगा है कृष्ण के पाँव में।

अपने समय का सबसे बडा चिन्तक, कूटनीतिज्ञ और कर्मयोगी घायल है।
झर-झर आँसू बहते हैं व्याध के नयनों से – “हाय !
धरती पर मनुज की प्रज्ञा का सर्वोच्च मानक मेरे शर से घायल है।
उनकी मृत्यु यदि होती है, तो इच्छा-क्रिया-ज्ञान का जीवन्त व्याख्यान एकबार पुनः ओझल हो जाएगा, सदियों के लिए।यह पाप मुझसे ही होना था।”

मुस्कुराते हैं कृष्ण – “नहीं रे व्याध ! कृष्ण और सत्य दो नहीं हैं। कृष्ण के इस रूप को ही उस परमसत्य की अन्तिम अभिव्यक्ति मत मानो। अभी उसकी असंख्य व्याख्याएँ होनी शेष हैं।”

“पर यह मनमोहन रूपधारी कृष्ण तो नहीं आएँगे।” – फूटफूटकर रो पडा व्याध।
कृष्ण ने अत्यन्त प्रेममय दृष्टि से व्याध को देखा – “सत्य सुन्दरतम है, इसलिए उनको जो सत्य को देखना-जानना-मानना-ग्रहण करना चाहते हैं, उनको मेरी छवि से भी अधिक ललितत-ललाम छवि के लोकधर्मी मिलते रहेंगे।”
कृष्ण योगमुद्रा में बैठ गये। थोडे ही समय में उनकी परम चेतना दिपदिपाने लगी। शरीर विसर्जित हो गया।
व्याध एक अनाख्येय आनन्द में मग्न हो रहा था।

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