मैं – Me

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वह हिरण्मय है
वह ज्योतिर्मय है
वह मुझमें विराजमान है
तो “मैं” इतना तमोमय क्यों है
अन्धकारमय क्यों है

कोई कहते हैं – मानो उसको
कोई कहते हैं – खोजो उसको
कोई कहते हैं – न मानो, न खोजो
तुम ही वह हो, ऐसे ही रहो
कोई कहते हैं – सच्चा प्रयास करो
मानकर खोजो, वह मिलेगा

जितने मुख उतनी बातें
जितने राही उतनी राहें
प्रश्न उस अन्धेरे से निकलने का है
या ज्योतिर्मय को पाने का है
जिसका उपदेश तो अनेक करते हैं
पर मिलाने की गारंटी कोई नहीं देता

यह काम “मैं” पर ही
छोड देते हैं सब ।

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