Browsing: Devanshu Jha

Devanshu Jha

Devanshu Jha
0

नदी नदी-किनारे बसे नगरों को देखकर मैं यह मानने लगा हूं कि नदी स्त्री है…

Devanshu Jha
0

पद्मावत के बहाने एक बार फिर…. लड़-लड़ जो रण बाँकुरे, समर, हो शायित देश की…

Devanshu Jha
0

घर मेरे घर का आँगन अपनी आँखें मलता हुआ नींद से जागा है अभी और…

Devanshu Jha
0

जब छूट जाता है अपना गांव-घर तब हम समझते हैं कि छूटी है पुरानी डगर …

Devanshu Jha
0

अद्धा खींचने के बाद जब बैठ गईं बिरजू की आंखें गुटखा खोलकर उसने तुलसी मिलाई…

Devanshu Jha
9.3
0

डायन पुरानी खिड़की के पास बैठी बूढ़ी दादी-सी दिखती थी वो आँखों में पीली दोपहर…

1 2 3 5